क्या सीताजी को भी युद्ध में आना पड़ा था, और क्यों? अनसुनी कथा
मुख्य बिंदु इस कथा से:
मूलकासुर कौन था?
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कुंभकर्ण का पुत्र, जिसका जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था, इसीलिए इसे अशुभ समझ कर जंगल में त्याग दिया गया।
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जंगल में मधुमक्खियों ने उसे पाला।
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ब्रह्माजी से कठोर तप कर उसे स्त्री के हाथों मृत्यु का वरदान मिला।
मूलकासुर का आतंक:
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लंका के पतन और रावण की मृत्यु के बाद वह विभीषण से बदला लेने लंका आया।
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विभीषण छह महीने तक युद्ध करता रहा, पर अंततः भगवान श्रीराम से सहायता मांगने अयोध्या पहुंचा।
श्रीराम का प्रयास:
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श्रीराम, लक्ष्मण, लव-कुश व सेना सहित लंका पहुंचे।
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7 दिन का घोर संग्राम हुआ, पर मूलकासुर को कोई नहीं हरा सका, क्योंकि वह ब्रह्माजी के वरदान से सुरक्षित था।
ब्रह्माजी का प्रकट होना:
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ब्रह्माजी ने राम को स्मरण कराया कि उसे केवल स्त्री ही मार सकती है, और यह भी बताया कि मूलकासुर ने सीता को "चण्डी" कहकर अपमानित किया था और मुनियों से श्राप पाया था कि वही चण्डी (सीता) उसकी मृत्यु का कारण बनेगी।
माता सीता का चंडी रूप:
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राम के बुलावे पर हनुमान और गरुड़ सीता को लेने पहुँचे।
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सीता ने जैसे ही युद्ध की बात सुनी, उनके शरीर से एक तामसी शक्ति प्रकट हुई — छाया सीता।
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वही छाया रूप "चण्डिका" बनकर युद्धभूमि में पहुँचीं।
युद्ध और वध:
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मूलकासुर के तांत्रिक यज्ञ में विघ्न डालने हेतु वानर सेना को गुफा में भेजा गया।
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मूलकासुर गुस्से में युद्धभूमि आया, जहाँ छाया सीता से घोर युद्ध हुआ।
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अंततः माता ने ‘चण्डिकास्त्र’ का प्रयोग कर उसका सिर काट दिया।
समापन:
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लंका की जनता ने माता सीता की जयकार की।
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छाया सीता पुनः सीता में विलीन हो गईं।
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कुछ समय बाद राम-सीता सहित सब अयोध्या लौट आए।
यह कथा क्यों महत्वपूर्ण है?
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यह कथा दिखाती है कि माता सीता केवल करुणा और सहनशीलता की प्रतिमूर्ति ही नहीं थीं, बल्कि जब समय आया तो उन्होंने चंडी रूप धारण कर राक्षस का वध किया।
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यह नारी शक्ति और धर्म रक्षा में स्त्री की भूमिका को उजागर करती है।
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ब्रह्माजी का यह कथन भी ध्यान देने योग्य है कि जब अन्य कोई न कर सके तो नारी ही रणभूमि में उतरती है और विजयी होती है।
स्रोत:
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यह कथा आनन्द रामायण में मिलती है, जो एक उत्तरकालीन रामायण है और वाल्मीकि रामायण का विस्तार मानी जाती है।
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इसमें अध्यात्म, तंत्र और भक्ति की गहराइयाँ हैं, जो मूल ग्रंथ में नहीं मिलतीं।
निष्कर्ष:
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माता सीता केवल पतिव्रता या पीड़िता नहीं थीं।
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वे शक्ति का साक्षात रूप थीं — अवसर आने पर उन्होंने चंडी बनकर राक्षसी शक्तियों का अंत किया।
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यह कथा हमें यह सिखाती है कि सहनशीलता तब तक ही मूल्य है जब तक धर्म की रक्षा संभव हो, जब धर्म पर संकट आए, तो सीता भी चंडी बन सकती हैं।