मकर संक्रांति का महत्व और जुड़ी पौराणिक कथाएँ

मकर संक्रांति का महत्व और जुड़ी पौराणिक कथाएँ

प्रस्तावना
मकर संक्रांति हिन्दू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र त्योहार है, जिसे पूरे भारत वर्ष में और नेपाल, श्रीलंका जैसे अन्य देशों में भी बड़ी श्रद्धा और हर्षोल्लास से मनाया जाता है। यह त्योहार सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश करने के अवसर पर मनाया जाता है। मकर संक्रांति न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका वैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी है।

मकर संक्रांति क्या है?

मकर संक्रांति उस दिन को कहते हैं जब सूर्य अपनी धनु राशि छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है। इसे उत्तरायण भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन से सूर्य अपनी दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की ओर गमन करता है। यह दिन भारतीय पंचांग के अनुसार पौष मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी या चतुर्दशी तिथि को आता है, जो ज्यादातर हर साल 14 जनवरी को पड़ता है।

इस दिन लोग सूर्य देव की पूजा-अर्चना करते हैं, स्नान करते हैं और अपने घर-परिवार में दान-पुण्य करते हैं। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान सौ गुना फलदायक होता है।

मकर संक्रांति कैसे मनाई जाती है?

मकर संक्रांति पूरे भारत में विभिन्न रीति-रिवाजों के साथ मनाई जाती है।

  • पंजाब और हरियाणा में इसे लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है, जहाँ लोग आग जलाकर उसमें तिल, गुड़, मक्के और अन्य सामग्री डालते हैं।

  • गुजरात और राजस्थान में पतंग उड़ाने का बड़ा उत्सव होता है।

  • तमिलनाडु में इसे पोंगल कहा जाता है, जिसमें खास तरह की खिचड़ी बनाई जाती है।

  • बिहार में खिचड़ी का त्यौहार कहा जाता है और दान किया जाता है।

  • बंगाल में तिल दान और गंगा सागर मेला होता है।

  • नेपाल में यह सरकारी छुट्टी होती है और किसान अपनी फसल की सफलता के लिए धन्यवाद देते हैं।

मकर संक्रांति का वैज्ञानिक महत्व

वैज्ञानिक दृष्टि से भी मकर संक्रांति का दिन खास है। इस दिन से उत्तरायण आरंभ होता है, यानी सूर्य की किरणें भारत की ओर बढ़ने लगती हैं। इससे मौसम में परिवर्तन आता है, सर्दी कम होती है और नदियों में वाष्पीकरण शुरू होता है, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। तिल और गुड़ खाने से शरीर को गर्माहट मिलती है और यह सर्दियों में ऊर्जा का अच्छा स्रोत होता है।

मकर संक्रांति से जुड़ी पौराणिक कथाएँ

मकर संक्रांति के साथ कई प्राचीन और महत्वपूर्ण पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं:

  1. सूर्य और शनि की कथा – कहा जाता है कि इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते हैं, क्योंकि शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं।

  2. महाराज भगीरथ और गंगा – महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा की स्तुति की थी और गंगा ने उनके तर्पण को स्वीकार किया था।

  3. भीष्म पितामह का मोक्ष – महाभारत के भीष्म पितामह ने उत्तरायण होने पर मोक्ष प्राप्त किया था।

  4. भगवान विष्णु का मधु-कैटभ वध – इस दिन भगवान विष्णु ने राक्षस मधु-कैटभ का वध किया था, इसलिए इसे बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में भी मनाया जाता है।

  5. मां यशोदा का व्रत – कहा जाता है कि इसी दिन मां यशोदा ने श्रीकृष्ण के जन्म के लिए व्रत रखा था।

निष्कर्ष

मकर संक्रांति न केवल एक धार्मिक पर्व है बल्कि यह भारतीय संस्कृति, कृषि, विज्ञान और समाज का अद्भुत संगम भी है। यह त्योहार हमें प्रकृति के चक्र का सम्मान करना सिखाता है, साथ ही दान-पुण्य, संयम और सौहार्द का संदेश देता है। इस दिन की पूजा और परंपराएं हमारे जीवन में नई ऊर्जा, उमंग और सकारात्मकता लेकर आती हैं।

मकर संक्रांति पर प्रकृति का सम्मान, सूर्य देव की उपासना, दान-पुण्य और सामाजिक मेलजोल इस पर्व को विशेष बनाते हैं। इसलिए इसे पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाना चाहिए।